Into Thin Air | A Personal Account of the Mt. Everest Disaster Full Summary in Hindi

 इंट्रोडक्शन 

A Personal Account of the Mt. Everest Disaster

आपको क्या लगता है, माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई करना कितनी ईज़ी होगा? दुनिया की ये सबसे ऊँची चोटी सदियों से इन्सान को अपनी तरफ अट्रेक्ट करती आई है और  चेलेंज भी देती आई है. लेकिन क्या आप जानते है कि इस ताकतवर और बेहद मुश्किल चढाई वाले पहाड़ की चोटी तक पहुँचने में हर चौथे आदमी की जान चली जाती है! 


Into Thin Air” ऑथर जॉन  क्रैकावर  की पर्सनल अकाउंट पर बेस्ड एक सच्ची घटना है जो उनके साथ तब घटी थी जब 1996 के माउंट एवरेस्ट चढ़ाई के दौरान जॉन पहाड़ से गिरते हुए बर्फ़ के ढेर के बीच फंस गए थे और किसी तरह अपनी जान बचा पाए थे. ये बुक एक बेस्ट सेलर है जिसमे जॉन ने 1996 के उस हादसे के बारे में काफी डिटेल से जानकारी दी है. उन्होंने उन आठ  लोगों के बारे में भी लिखा है जो बदकिस्मती से मौत का शिकार हो गए थे. 


जॉन एक प्रोफेशनल जर्नलिस्ट है जिन्हें उनकी  मैं गजीन आउटलुक की तरफ से माउंट एवरेस्ट के कमर्शियलाईज़ेशन के बारे में आर्टिकल लिखने के मकसद से भेजा गया था पर ये कोई नहीं जानता था कि उनके और उनकी टीम के साथ ऐसा दर्दनाक हादसा हो जायेगा. 


इस समरी में आप उन बहादुर पहाड़ चढ़ने वालों की कहानी जानेंगे जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर rescue  मिशन को अंजाम दिया और उन  लोगों  के बारे में भी जिन्होंने अपने साथियों की जान बचातेहुए खुद अपनी जान गंवा दी. ये बुक रेस अगेंस्ट टाइम की कहानी सुनाती है जहाँ पहाड़ चढ़ने वाले यानी climbers  ऑक्सीजन की कमी के चलते एक-एक सांस के लिए स्ट्रगल करने को मजबूर थे. 


Everest Summit
May 10, 1996 • 29,028 Feet


माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने का मेरा हमेशा सपना रहा था. ये एक ऐसा पल था जिसका मैं बचपन से इंतजार कर रहा था और ये बड़ी इंट्रेस्टिंग सी बात है कि जब आखिरकार  मैं  दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर पंहुचा और अपने सामने वो नज़ारा देखा जो  मैं  हमेशा से देखना चाहता था, उस वक्त मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने जिंदगी में सब कुछ पा लिया है.


 ऐसा सिर्फ मुझे ही  नहीं  बल्कि हर उस climber को महसूस हो रहा था जो पहली बार माउंट एवरेस्ट के पीक  पर आया था क्योंकि ऊपर चोटी तक पहुँचने के बाद भी अभी सफर खत्म  नहीं  हुआ था. हमारी लड़ाई वक्त के साथ थी क्योंकि इससे पहले कि हमारी बॉडी हमारा साथ छोड़ दे, हमे हर हाल में बेस कैंप पहुंचना था. ये 10 मई, 1996 की बात थी.  


मैं  पिछले 57 घंटों से सोया नहीं था. मैंने खाना भी लगभग ना के बराबर खाया था और ऊपर से खांसी के मारे मेरा बुरा हाल था. हाई ऑल्टीट्यूड होने की वजह से ऊपर ऑक्सीजन का लेवल बेहद कम था और ऑक्सीजन की कमी के चलते मेरी मेंटल पॉवर कमज़ोर  हो चुकी थी. सिवाए ठंड और बेहोशी के मुझे कुछ और महसूस  नहीं  हो रहा था. उस वक्त माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई करने के पीछे दो मिशन थे, एक अमेरिकन कमर्शियल के लिए था और दूसरी न्यूज़ीलैंड बेस्ड टीम था जिसमें  मैं  भी शामिल था. 


 मैं  एवरेस्ट की चोटी पर रशियन गाईड अनातोली बुक्रीव (Anatoli Boukreev)के कुछ मिनट बाद ही पहुंचा था जोकि अमेरिकन टीम के साथ आया था. वैसे  मैं  न्यूज़ीलैंड बेस्ड टीम के गाईड एंडी हैरिस से आगे चल रहा था. सुनने में थोडा अजीब लगता है पर दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर मैंने सिर्फ 5 मिनट गुज़ारे. इस दिन, इस पल का मुझे इतने लम्बे वक्त से इंतज़ार था और जब आखिर वो पल आया तो  मैं  पांच मिनट से ज्यादा  नहीं  रुक पाया. 


ऑक्सीजन की भारी कमी के चलते चोटी पर ज्यादा देर ना रुकने की सलाह दी जाती है क्योंकि ये काफी रिस्की होता है, यहाँ इन्सान बेहोश हो सकता है और उसकी बॉडी काम करना बंद कर देती है. इसलिए आप जितना ज्यादा ऊपर रुकेंगे, जिंदा बचने के चांसेस उतने ही कम होंगे. 


आज लोग उस मिशन  के बारे में सोचते है तो उन्हें बादलो से ढका आसमान और वो खतरनाक तूफानी मौसम याद आता है. तूफ़ान इस हद तक खतरनाक था कि छह डेड बॉडी मिलने के बाद रेस्क्यू टीम दो और लापता  लोगों  की तलाश में  नहीं  जा पाई थी, और एक बंदे को अपना हाथ गंवाना पड़ा, लोग ये सोचकर हैरान थे कि ऐसे तूफ़ान में आखिर वो आगे बढ़ ही क्यों रहे है? 


इस हादसे में ग्रुप्स के लीडर्स दोनों गाईड की भी मौत हो चुकी थी  इसलिए वो उन सवालों का जवाब नहीं दे सकते. लेकिन  मैं  आपको बताता हूँ कि 10 मई की वो सुबह एकदम शांत थी. चोटी से नीचे उतरते हुए काफी कुछ बदल जाता है. सच कहूं तो उस वक्त मुझे मौसम की ज़रा भी परवाह  नहीं  थी. मेरे  मन  में तो सिर्फ मेरा ऑक्सीजन टैंक था, ऑक्सीजन ऑलमोस्ट खत्म होने को था  और मुझे हर हाल में जल्द से जल्द कैंप तक पहुँचना था.  


मैं  15 मिनट तक नीचे की तरफ आता रहा और हिलरी  स्टेप तक पहुंचा. हिलरी स्टेप माउंट एवरेस्ट का वो रिज (ऊँचा उठा हुआ तंग रास्ता) है जिसकी चढ़ाई बेहद मुश्किल होती है और सिर्फ रस्सियों की मदद से ही इस पर चढ़ा जा सकता है. लेकिन मैंने हिलरी स्टेप पर जो  देखा, वो खौफनाक था. 


मैंने करीब एक दर्ज़न  लोगों  को कतार में खड़े देखा जो चढाई के इंतज़ार में थे. ये बेहद रिस्की सिचुएशन थी क्योंकि उन्हें चढने में ज्यादा वक्त लगता जिससे उनके ऑक्सीजन टैंक जल्दी खत्म हो सकते थे और ट्रेफिक जाम उन तीन मिशन की वजह से लगा था जो एवरेस्ट पर आये थे. उनमे से एक टीम मेरी भी थी जिसका लीडर था रॉब हॉल. सेकंड टीम का लीडर स्कॉट फिशर था और तीसरी टीम एक ताईवान की टीम थी. 


जब  मैं  उस भीड़  के बीच से गुजर रहा था तो मुझे रॉब हॉल और अपनी टीम का एक और मेंबर यासुको नम्बा मिले. नम्बा 47 साल की थी और अब तक कि सबसे बड़ी उम्र की औरत थी जो माउंट एवरेस्ट की चढाई करने जा रही थी. वो अब तक 6 continent  के 6 पहाड़ की चोटियों पर  चढ़ चुकी थी और अब ये उसका साँतवी छोटी थी. 


कुछ देर बाद हमारी टीम का एक और मेंबर पहुंचा, डग  हैंसन और फाईनली लाइन के एंड में न्यूजीलैंड टीम का लीडर था स्कॉट फिशर. जिस वक्त  मैं  माउंटेन की एक छोटी पीक साउथ समिट तक पहुंचा उस वक्त तीन बज रहे थे. मौसम मुझे अभी से गडबड नजर आ रहा था.  


मैंने एक और ऑक्सीजन सिलिंडर लगा लिया था और अब थोडा और नीचे की तरफ आ गया था. इस वक्त तक हमे आने वाले खतरे का जरा भी अंदाज़ा नहीं था. अब तक किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक-एक पल हम पर भारी पड़ने वाला है और हमारे सामने जिंदगी और मौत का सवाल खड़ा हो जायेगा. 


Dehra Dun, India
1852 • 2,234 फीट 

1852 में देहरादून में Great Trigonometrical Survey of India का एक क्लर्क इंडिया के surveyor-general के पास भागा-भागा पहुंचा. उस वक्त surveyor-general था एंड्रू वॉ. क्लर्क ने खबर दी कि एक बंगाली  मैथमेटीशियन और surveyor ने दुनिया की सबसे ऊँची पर्वत चोटी ढूंढ निकाली है. ब्रिटिश एरा में दरअसल इन surveyor को कंप्यूटर कहा जाता था जो ब्रिटिश गवर्नमेंट के अंडर काम करते थे, यानि हम गर्व के साथ कह सकते है कि दुनिया की सबसे ऊँची चोटी का पता लगाने वाला एक बंगाली इन्डियन था जिसने बगैर चढ़ाई किये माउंट एवरेस्ट की उंचाई निकाल ली थी. 


सर जॉर्ज एवरेस्ट जोकि वॉ से पहले surveyor-general था, उनके सम्मान  में इस चोटी का नाम माउंट एवरेस्ट रखा गया. फिर जब ये बात कन्फर्म हो गई कि एवरेस्ट ही दुनिया की सबसे ऊँची पर्वत चोटी है तो दुनिया भर के  लोगों  ने इस चोटी को एक चैलेंज की तरह लिया और तभी से इस पर चढाई करने का ट्रेडिशन चल पड़ा. लेकिन इससे पहले कि कोई इस चोटी तक पहुँचता, 24  लोगों  की जान गई, 15 मिशन  हुए और कम से कम 101 साल लग गए तब जाकर इन्सान इस चोटी तक पहुँच पाया था. 


पहले के जो आठ मिशन ब्रिटिश के अंडर में हुए. उन  लोगों  ने tibet  की तरफ से माउंट एवरेस्ट पर चढने की कोशिश की थी. फिजिकल फीचर्स के हिसाब से देखा जाए तो  Tibet उनकी पहली चॉइस  नहीं  थी लेकिन और कोई ऑप्शन भी  नहीं  था क्योंकि नेपाल में तब फॉरेनर्स की एंट्री पर पाबंदी थी. फिर 1948 में जब  Tibet  चाइना के अंडर आया तो  Tibet  के बॉर्डर भी foreigners के लिए बंद हो गए,पर एक साल बाद नेपाल ने बाहरी दुनिया के लिए अपने बॉर्डर खोल दिए. 1953 में नेपाल साइड से माउंट एवरेस्ट पर तीसरी बार चढ़ाई की कोशिश की गई. ये भी एक ब्रिटिश मिशन  था. 


न्यूज़ीलैंड के एक माउंटेनियर एडमंड हिलरी और एक शेरपा (पहाड़ी ईलाको में रहने वाले नेटिव लोग) तेंजिंग नोर्गे एवरेस्ट की चोटी पर चढाई करने निकले. सुबह 9 बजे वो दोनों साउथ समिट पहुँच गए थे और एक घंटे बाद वो हिलरी स्टेप पहुंचे.  तेनज़िंग  ने एडमंड की तरफ रस्सियाँ फेंकी जो वर्टिकल स्लोप पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे. बाद में यही जगह उनके नाम से फेमस हुई यानि वो पहले इन्सान थे जो इस पर चढ़ने में सक्सेसफुल रहे थे. 


29 मई, 1953 के दिन एडमंड और  तेनज़िंग  ने इतिहास रच दिया था , दोनों माउंट एवरेस्ट पर चढने वाले पहले इंसान थे. उसके बाद से तो जैसे माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने की होड़ सी लग गई. पहाड़ों पर  लोगों  की दिन ब दिन बढती भीड़ काफी खतरनाक साबित हो सकती थी इसलिए नेपाल गवर्नमेंट ने climbing परमिट के लिए फीस लेनी शुरू कर दी. 


ऐसा इसलिए किया गया ताकि ज्यादा  लोगों  को एवरेस्ट पर चढने से रोका जा सके. ये उस ईलाके में natural  डिजास्टर की वजह बन सकता था. लेकिन ऊँची फीस के बावजूद एवरेस्ट के प्रति  लोगों  का आकर्षण  कम  नहीं  हुआ और साल दर साल लोगों की भीड़ बढती ही गई.


 मार्च 1995 में मुझे अपनी  मैगजीन के एडिटर का फोन आया, जिनके साथ  मैं  पहले काम कर चुका था.आउटसाइड के एडिटर मार्क ब्रायंट, ने मुझे माउंट एवरेस्ट मिशन  पर जाने का ऑफर दिया जोकि पांच दिन में शुरू होने वाला था. मुझे माउंटेन को कमर्शियलाईज करने  के ऊपर एक रिपोर्ट लिखकर भेजनी थी. प्लान ये था कि  मैं  सिर्फ बेस कैंप तक जाउंगा और अपना काम पूरा करके लौट आऊंगा. 


लेकिन माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का ख्वाब  मैं  बचपन से देखता आ रहा था तो भला ऐसा  कैसे हो सकता था कि  मैं  सिर्फ बेस कैंप तक जाकर लौट आऊँ. मैंने एडिटर से पूछा क्या वो ट्रिप को 12 महीने के लिए पोस्टपोन कर सकता है ताकि  मैं  एवरेस्ट पर चढने की तैयारी कर सकूं. पता  नहीं  कैसे पर एडिटर साहब मेरी बात मान गए और फरवरी 1996 में मार्क ने मुझे फ़ोन करके बताया कि रॉब हॉल के ग्रुप  में मेरे लिए जगह है और अब  मैं  फाइनली माउंट एवरेस्ट जाने को तैयार था. 


Over Northern India
March 19, 1996 • 30,000 Feet
Phakding

March 31, 1996 • 9,186 feet


नेपाल के काठमांडू एयरपोर्ट पहुंचकर  मैं एंडी हैरिस से मिला. एंडी हैरिस रॉबर्ट हॉल के गाईड में से  एक था. काठमांडू के एकदम बीचो बीच थामेल में मेरा होटल था. एक घंटे बाद फाईनली मेरी मुलाक़ात रॉब हॉल से हुई.  रॉबर्ट  हॉल न्यूजीलैंड में पैदा हुआ था और अपने नौ भाई-बहनों में सबसे छोटा था. 


वो एक स्कूल ड्राप आउट था और कम उम्र में ही उसने Alp Sports में काम करना शूरू कर दिया था जोकि क्लाइम्बिंग इक्विपमेंट बनाने वाली  कंपनी थी. Alp Sports में काम करते हुए रॉबर्ट  ने मिशन  में पार्टीसिपेट करना शुरू कर दिया था और कई सारे माउंटेन की चढाई कर ली थी. हॉल सर एडमंड के बेटे पीटर हिलरी के साथ भी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ चुका था और अब तक 39 climbers को बखूबी  माउंट एवरेस्ट की चढाई करवा चुका था. 


मेरे काठमांडू पहुँचने के दो दिन बाद  मैं लुक्ला जाने के लिए त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुंचा जो हमारी जर्नी का  स्टार्टिंग पॉइंट था. वहां  मैं  अपनी टीम के बाकि मेंबर्स से भी मिला. उनमे बेस कैंप  मैनेजर हेलेन विल्टन और एक फिजिशियन कैरोलीन मैकेंज़ी भी थी. 


इन दोनों को बस बेस कैंप तक ही जाना था बाकि  climbers  जिनमे Lou Kasischke एक लॉयर थे, यासुको नम्बा, एक जैपनीज लेडी और बेक वेदर्स एक पैथोलोजिस्ट थे. एक केनेडियन कार्डियोलोजिस्ट स्टुअर्ट हचीशन और एक पब्लिशर फ्रैंक फिश्बेक भी हमारे साथ ही ट्रेवल कर रहे थे. टीम का सबसे उम्रदराज़  मेंबर था जॉन टास्क जो  ब्रिसबेन से आया था.  


फाइनल मेंबर् जिसके साथ  मैं  सबसे ज्यादा घुल-मिल गया था और जिससे मेरी अच्छी दोस्ती हो चुकी थी, वो था डग  हैंसन.डग  ने इससे पहले भी हॉल के साथ 1995 में एवरेस्ट पर चढने की कोशिश की थी मगर अब वो साउथ समिट में दोबारा  आ गया था. ट्रेक की पहली रात हमने एक छोटे से गाँव फाक्डिंग में बिताई जहाँ बहुत से घर थे. 


उसके बाद हमने आगे की चढाई ज़ारी रखी जब तक कि हम नामचा बाज़ार  नहीं  पहुँच गए. यहाँ मेरा इंट्रोडक्शन माइक ग्रूम से कराया गया जो हमारे मिशन  का एक और मेंबर था. मैंने देखा उसके पैर के दोनों अंगूठे  गायब थे, दुनिया के तीसरे नंबर की ऊँची चोटी कंचनजंगा से नीचे उतरते वक्त उसके अंगूठे सुन्न  हो गए थे. 


लुक्ला एयरस्ट्रिप से एवरेस्ट बेस कैंप पहुँचने में दो-तीन दिन लगते है पर  रॉबर्ट  हॉल ने हमे वेटिंग में रखा ताकि हमारी बॉडी थिन एयर या कम हवा में एडजस्ट कर सके. 3 एप्रिल को हम बेस कैंप के लिए निकल पड़े. सब अपनी-अपनी रफ़्तार  में चल रहे थे. मैंने देखा कि  मैं  ज्यादातर रॉब हॉल, डग  हैन्सन और एंडी हैरिस के साथ चल रहा था. 


एंडी अपनी गर्लफ्रेंड फियोना जोकि एक फिजिशियन थी, के बारे में बता रहा था. उसने मुझे उसकी तस्वीर  भी दिखाई. हम लोग लोउजे पहुँच चुके थे. ये जगह बेस कैंप से सिर्फ 7 मील दूर थी. इससे पहले कि हम आगे की जर्नी कंटीन्यू करते, हमे एक बुरी ख़बर मिली. 


एक जवान  शेरपा  तेनज़िंग क्रेवास में गिर गया था और उसे काफी गहरी चोटें आई थी. आपकी जानकारी के लिए बता दूं, क्रेवास ग्लेशियर के बीच की उन गहरी दरारों को कहते है जो आपको माउंटेन में हर जगह मिलेंगी. इन क्रेवासेस की वजह से भी कई climbers जान से हाथ धो बैठते है. इसलिए सिचुएशन अंडर कण्ट्रोल होने तक हमे भी वेट करने को कहा गया. 


रॉब हॉल उन  लोगों  में से नहीं था जो इस तरह का खतरा मोल ले. उसे अपने गाईडेंस में सबकी फ़िक्र थी, उन शेरपा  लोगों  की भी जो इन पहाड़ो में हमारी मदद करने और हमे सेफ रखने के लिए हमारे साथ चल रहे थे. 


Lobuje April 8, 1996 • 16,200 Feet
Everest Base Camp

April 12, 1996 • 17,600 Feet

हमने अपने हाथो में जो रेडियो पकड़े हुए थे उससे हमे रॉब की आवाज़ सुनाई दी. वो हमे बेस कैंप से कॉल कर रहा था और उसने हमे ये अच्छी खबर  दी कि अगली सुबह  हम चढाई शुरू करेंगे. मुझे अचानक से खाँसी शुरू हो गई थी जो अब बढती ही जा रही थी. रात गुज़ारने के लिए  मैं  एंडी के साथ एक टेंट में चला गया. एंडी खुद बीमार लग रहा था. सुबह वो काफी थका और डीहाएड्रेटेड लग रहा था. हेलेन ने उसे सलाह दी कि उसे एक रात और रुक जाना चाहिए लेकिन एंडी ने साफ़ मना कर दिया. वो हम  लोगों  के साथ ही बेस कैंप से जर्नी स्टार्ट करना चाहता था.


हमारे बाकि साथी  काफी तेज़ी से चढाई कर रहे थे जबकि हेलेन और  मैं  थोडा पीछे रुक गए ताकि एंडी के साथ चल सके और जब हम फाईनली वहां पहुचे तो सबसे पहले रॉब ने आकर हमे ग्रीट किया. बेस कैंप में हम सी लेवल से सिर्फ तीन मील ऊपर थे. यहाँ हर रात घुटन  से मेरी नींद टूट जाती थी. मुझे फील होता था जैसे मेरी सांस बंद हो गई हो, मेरी भूख एकदम मर गई थी. हाई ऑल्टीट्यूड सिकनेस की वजह से कई और  लोगों  की भी तबियत खराब हो रही थी. हमारा साथी  डग दूसरी बार एवरेस्ट की चढाई कर रहा था.


उसकी पहली कोशिश इसलिए फेल हो गई थी क्योंकि रॉब हॉल ने उसे टॉप से 330 फीट नीचे वापस लौंटा दिया था. आगे की चढाई करने में काफी देर हो चुकी थी इसलिए उन्हें वापस नीचे उतरना पड़ा क्योंकि सेफ एक्सपेडीशन के लिए टर्नअराउंड टाइम दोपहर 2 बजे के करीब होता है और वो लोग लेट हो चुके थे. 


बाकि  climbers  के मुकाबले मैंने हाई ऑल्टीट्यूड में लास्ट  टाइम स्पेंड किया था. लेकिन रॉब हॉल को कोई टेंशन  नहीं  हुई, उसने बताया कि बेस कैंप के ऊपर सिर्फ तीन ट्रिप के बाद मेरी बॉडी क्लाइमेट के हिसाब से एडजस्ट  कर लेगी. रॉब हॉल की टीम में शेरपा को मिलाकर टोटल 26 लोग थे.


प्लान ये था कि क्लाइंट के पहुँचने से पहले ही शेरपा के लिए बेस कैंप के ऊपर चार कैंप  खड़े कर दिए जायेंगे. टॉप की तरफ जाने वाले एक रास्ते  में फेमस खुम्बू ग्लेशियर भी आता है. इस ग्लेशियर में कई जानलेवा क्रेवास है और खुम्बू आइस फॉल तो इससे भी खतरनाक है जिसे क्रोस करने के लिए काफी स्ट्रोंग टेक्निकल सपोर्ट की जरूरत पडती है. इस आइस फॉल की वजह से कम से कम 19 climbers की जान गई है. 


13 एप्रिल, 4 बजकर 45 मिनट पर  मैं  इस आइस फॉल के नीचे पंहुचा. रॉब हॉल सबसे आगे थे और बाकि उन्हें फॉलो  कर रहे थे.  मैं  इससे पहले भी कई आइस फॉल क्रोस कर चुका हूँ पर ये सबसे डरावना था. क्रेवास के ऊपर सीढ़ियाँ पड़ी हुई थी, कई बार क्रेवास सिकुड़ सकती हैं  तो सीढियाँ मुड़  जाती थी और कभी क्रेवास के फैलने  से सीढियाँ एक साइड को झूलने लगती थी . 


मेरा दिल बुरी तरह धड़क रहा था. 8:30 के करीव फाईनली  मैं  उस आइस फॉल के टॉप पर पहुंचा. रॉब हॉल ने पहले ही बोल रखा था कि वो कैंप वन से सुबह 10 बजे तक लौट आयेंगे चाहे बाकि पहुंचे या न पहुंचे.


इसका कारण  ये था कि दोपहर 12 बजे सूरज की रौशनी में आइस फॉल पर चढ़ना बेहद रिस्की और अनस्टेबल हो सकता था. लेकिन ख़ुशी की बात ये थी कि हर कोई टाइम से पहुँच गया था और रॉब इस बात से काफी इम्प्रेस हुए.वहां से हमे बेस कैंप लौटने के लिए एक और घंटे का टाइम लग गया.  मैं  सीधा अपने टेंट में सोने चला गया. हेलेन मुझे आवाज दे रही थी कि मेरी वाइफ लिंडा कॉल कर रही है.  


मैं  कॉल अटेंड करने गया, मैंने लिंडा से सेटेलाईट फोन पर बात की. लिंडा पहले खुद एक climber रह चुकी थी, लेकिन कुछ चोटों  की वजह से उसे ये  छोड़ना पड़ा था. हमारी शादी को पंद्रह साल हो चुके थे. यहाँ आने से पहले जब वो मुझे एयरपोर्ट पर छोड़ने आई तो उसने मुझसे कहा था कि अगर इस मिशन  में मेरी मौत  हो गई तो उसे भी काफी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. तब मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा था” घबराओ मत, मुझे कुछ  नहीं  होगा”.


Camp One
April 13, 1996 • 19,500 Feet

 

ड्रीमर्स ऊँचे पहाड़ो पर चढ़ चुके थे. ऐसे लोग जिन्हें माउंटेनियरिंग का कोई एक्सपीरिएंस भी नहीं था, वो भी दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर पहुंचे है.  मैं  खुद ज्यादा एक्स्पिरियेंस्ड नहीं हूँ लेकिन  मैंने  अपने चारों ओर ऐसे लोग भी देखे है जो अपनी पूरी लाइफ में किसी पहाड़ पर  नहीं  चढ़े. ऐसा लग रहा था जैसे बेस कैंप के आधे लोग किसी ख्याली दुनिया में खोये है.


ऐसे बहुत से लोग थे जो एवरेस्ट की चोटी तक कामयाबी से  पहुँच भी गए और बहुत से ऐसे बदकिस्मत थे जो नाकामयाब  रहे.13 एप्रिल के दिन हम एक बार फिर से कैंप one पर चढ़े. तब तक ताईवानीज ग्रुप भी पहुँच चुका था जो काफी एक्सपीरियेंस्ड लग रहे थे. वैसे उन्हें ग्लेशियर क्रोस करने की टेक्नीक और टूल्स वगैरह की ज्यादा जानकारी  नहीं  थी.


हम सब डरे हुए थे कि कही अगर वो किसी बर्फीले तूफ़ान में फंसे तो सबको रेस्क्यू के लिए भागना पड़ेगा. खैर, सिर्फ ताईवानीज़ ही अकेले अंडर क्वालीफाईड लोग  नहीं  थे. वहां कई सारे सोलो  climbers  भी आये हुए थे जो खतरनाक रास्तों  से चढाई कर रहे थे. 


कैंप वन पर हमारे सेकंड ट्रिप के बाद हमने ऊपर चढने से पहले बेस कैंप में दो दिन आराम किया. अब मुझे लग रहा था कि मेरी बॉडी धीरे-धीरे हाई ऑल्टीट्यूड के हिसाब से एडजस्ट  हो रही है. 


सुबह 9 बजे जब हम कैंप वन की मेन साईट में पहुंचे, मेरी मुलाक़ात एंग  दोरजे से हुई. वो काफी तगड़ा और मजबूत climber लग रहा था. 


एंग ठोस जमी हुई बर्फ पर टेंट गाड़ने की कोशिश कर रहा था. मैंने खुदाई में उसकी मदद की पर  मैं  जल्दी ही थक गया. सारे शेरपा मुझ पर हंस रहे थे और कह  रहे थे कि अभी तो हम कैंप वन में ही है, जहाँ एयर थिक है यानी ऑक्सीजन भरपूर है, ऊपर जब थिन एयर मिलेगी तो मेरा क्या होगा. 


हम जब कैंप टू की तरफ बढ़ रहे थे तब ठंड हद से ज्यादा बढ़ गई थी. टेम्प्रेचर फ्रीजिंग पॉइंट पर पहुंच चुका था जिस वजह से आगे रास्ता काफी धुंधला था. हम एक नीले प्लास्टिक शीट में लिपटी किसी चीज़ के पास से गुज़र रहे थे. 


मैं  उस चीज़ को गौर से देखते हुए समझने की कोशिश कर रहा था कि ये आखिर है क्या, तभी मुझे पता चला कि  मैं  एक लाश  को घूर रहा हूँ. उस रात मैंने रॉब से पूछा” वो किसकी बॉडी थी” तो उसने बताया कि वो एक शेरपा की बॉडी थी जो तीन साल पहले यहाँ मरा था.

 

कैंप टू में कुछ देर रहने के बाद  मैं जब थोड़ी एक्सरसाईंज़ करने ऊपर गया तो वहां मुझे एक और लाश  पड़ी दिखी. ये लाशे एवरेस्ट पर पिछले 10 सालो से भी ज्यादा वक्त से पड़ी थीं.मैंने लाख कोशिश की पर इन लाशों की तस्वीर मेरे मन  से हट ही नहीं रही थी. 


22 एप्रिल के दिन हम कैंप टू से वापस बेस कैंप में लौट आये. जब मैं  अपने कैंप में लौटा तो  मैंने देखा कि रॉब, डॉक्टर कैरोलीन और स्कॉट फिशर के डॉक्टर इंग्रिड हंट किसी से बातचीत कर रहे थे जो ऊपर पहाड़ो पर खड़ा था. स्कॉट फिशर का शेरपा नगावांग  तौशे (Ngawang Touche) एक ग्लेशियर पर बैठा था. 


स्कॉट ने जब पूछताछ की तो पता चला कि उसकी  तबियत खराब है और शेरपा कल्चर में ज्यादातर मर्द अपनी बीमारी  या तकलीफ के बारे में बोलते  नहीं  है और जो बोलते है उन्हें ब्लैक लिस्ट कर दिया जाता है ताकि वो फ्यूचर में किसी भी मिशन  में शामिल ना हो. स्कॉट ने अपने शेरपा को नीचे आने को कहा लेकिन वो उसकी बात अनसुनी करके कैंप टू की तरफ बढ़ता जा रहा था. खासंते वक्त उसके मुंह से खून निकल रहा था. 


उसे High Altitude Pulmonary Edema यानी  HAPE हुआ था. इस बीमारी  में लंग्स के अंदर पानी भर जाता है और बचने का तरीका यही है कि इन्सान तुरंत लो-ऑल्टीट्यूड में आ जाए. हॉल ने अपनी टीम को साथ में रहने को कहा , लेकिन स्कॉट ने अपने टीम मेंबर्स को अपनी मर्ज़ी से माउंटेन एक्सप्लोर करने की परमिशन दे दी थी. जिसका नतीजा ये हुआ कि इस घटना के वक्त नगावांग  के आस-पास सिर्फ चार साथी  थे और कोई भी गाइड मौजूद  नहीं  था. 


उसे पूरी रात ऑक्सीजन पर रखा गया और अब उसकी हालत में कुछ ठीक लग रही थी. लेकिन सुबह फिर से उसकी तबियत तेज़ी से बिगड़ने लगी. लेकिन एक दूसरा शेरपा अब भी मानने को तैयार  नहीं  था कि नगावंग को हेप हुआ है. उसकी उल्टीयां रुकने का नाम  नहीं  ले रही थी और शरीर  एकदम नीला पड़ गया था, उसे कार्डियक अरेस्ट आया था जिससे उसे साँस लेने में तकलीफ हो रही थी. 


उल्टियों के बावजूद इंग्रिड उसे माउथ टू माउथ सांस  दे रही थी. आखिर में दस मिनट बाद किसी तरह उसकी पल्स वापस आई. हेलीकॉप्टर ईवेक्यूवेशन की रिक्वेस्ट भेज दी गई थी. वो लोग नगावांग को होस्पिटल लेकर गए. उसका वेट घटकर 80 पौण्ड से भी कम हो गया था, और आखिरकार दो महीने बाद उसकी मौत हो गई. 


Camp Two
April 28, 1996 • 21,300 Feet, 

Lhotse Face 
April 29, 1996 • 23,400 Feet


दो दिन पहले हम लोग दिन भर चढाई करने के बाद कैंप वन से कैंप टू पहुंचे थे और अब कैंप थ्री की जर्नी के लिए तैयार थे. इस वक्त सुबह के 4 बज रहे थे और हमे 4: 45 तक निकलना था. मैं तैयार  हुआ, मुझे भूख तो  नहीं  थी पर मैंने जबर्दस्ती एक कैंडी बार खाई और थोड़ी सी चाय पी. हम अभी चढाई शुरू करने ही जा रहे थे कि हमने रेडियो पर रॉब को सुना. 


वो बोल रहा था कि मौसम बेहद खराब है और काफी तेज़ हवाएं चल रही है इसलिए हम लोग नीचे उतर आए . हम एक बार फिर से कैंप टू की तरफ बढ़े और दोपहर होते-होते पहुँच गए. नेपाल आने से पहले डग की एक छोटी गले की  सर्जरी हुई थी. उसकी विंडपाइप अभी पूरी तरह हीलं  नहीं  हुई थी इसलिए उसे बोलने में भी तकलीफ हो रही थी. 


वो ये सोचकर और परेशान हो रहा कि वो चढाई  नहीं  कर पायेगा. अपने दोस्त के लिए मुझे काफी दुःख हो रहा था क्योंकि वो दूसरी बार इस उम्मीद से  आया था कि एवरेस्ट पर चढाई कर सके. हम सबका ठंड के मारे बुरा हाल था और वहां मिशन के  लीडर्स किसी बात पर बहस कर रहे थे. 


आखिर में फैसला लिया गया कि स्कॉट की टीम, हॉल की टीम, ताईवानीज टीम और एक और साउथ अफ्रीकन टीम में से हर एक टीम के दो मेंबरऊपर जाकर रस्सियाँ  फिक्स कर आयेंगे पर दूसरी टीम सहयोग  करने को तैयार  नहीं  थी. 


ताईवानीज टीम के लीडर ने रॉब से माफ़ी मांग ली थी पर साउथ अफ्रीकन टीम का लीडर रॉब की इन्सल्ट किये जा रहा था. उसने रॉब से कहा कि किसी ने भी उसके गाइड के पास आकर हेल्प  नहीं  मांगी थी. डग को छोड़कर हर कोई कैंप थ्री पर चढने की तैयारी कर रहा था. 


वो गला ठीक होने तक बेस कैंप में ही रूका रहा. अगले दिन हम वापस कैंप टू आये और 1 मई को बेस कैंप पहुंचे.  रॉबर्ट  हॉल की स्ट्रेटेज़ी मुझ  पर अच्छा असर कर रही थी. बेस कैंप पर एयर अब थोड़ी थिक लग रही थी. लेकिन मेरी खांसी रुकने का नाम  नहीं  ले रही थी. हॉल का प्लान था कि हम लोग फाईनली 10 मई को टॉप पर पहुचंने के लिए चढाई करेंगे और यही प्लान स्कॉट फिशर और उसकी टीम का भी था. 


Base Camp May 6, 1996 • 17,600 Feet, Camp Three
May 9, 1996 • 24,000 Feet, Southeast Ridge
May 10, 1996 • 27,600 Feet


6 मई, को हम एक बार फिर से बेस कैंप से कैंप टू की तरफ चल पड़े. कैंप टू में फिशर अपने गाइड एनातोली बुक्रीव को इंस्ट्रक्शन दे रहा था कि वो ग्रुप के साथ रहे और सब पर नज़र रखे पर बुक्रीव ने उसकी बात एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दी और खुद सोने चला गया. 


वो लास्ट क्लाइंट से पांच घंटे बाद कैंप टू पहुंचा था. एक और टीम मेट क्रूस जब सरदर्द की वजह से बेहोश हो गया था तब बुक्रीव वहां से गायब था. 


पूरे मिशन  में दोनों के बीच तनातनी रही. वैसे फिशर ने बुक्रीव को इस मिशन  के लिए अच्छी-खासी फीस दी थी इसके बावजूद वो फिशर की उम्मीदों  पर पूरा  नहीं  उतर पाया था. तंग आकर फिशर ने सीएटल कॉल करके अपने बिजनेस पार्टनर से बुक्रीव की शिकायत  कर दी. 


फोन के दूसरी तरफ  लोगों  को शायद उस वक्त अंदाजा भी  नहीं  होगा कि ये स्कॉट की आखिरी कॉल होगी. 8 मई, को  रॉबर्ट  की टीम और स्कॉट की टीम कैंप टू से Lhotse जाने के लिए निकली. हम सबको अपनी बाकि की जर्नी के लिए ऑक्सीजन टैंकऔर मास्क पकडा दिए गए. 


पूरी रात रॉब हमे ऑक्सीजन टैंक से सांस लेना सिखाता रहा. उसने कहा कि इस ऑल्टीट्यूड पर एक-एक मिनट हमारे माइंड और बॉडी पर भारी पड़ सकता है. हमारे ब्रेन सेल्स मर रहे थे और बोटल्ड ऑक्सीजन इस प्रोसेस को स्लो डाउन कर देगी. 


लेकिन मास्क की वजह से घुटन  हो रही थी तो  मैं  इसके बगैर ही सो गया. एक तो कैंप थ्री में पूरी रात मुझे नींद  नहीं  आई, ऊपर से ऑक्सीजन बोटल की बॉडी को आदत  नहीं  थी. रात करीब 1 बजे  मैं  साउथ Col. पहुंचा. साउथ Col.इस समिट के लिए हमारा लॉन्च पैड था. शेरपा लोग टेंट लगाने की जद्दोजहद में थे. 


दोपहर ढलते-ढलते मौसम बिगड़ने लगा. हमारी टीम का लास्ट मेंबर 4:30 तक पहुंचा और  बाकि लोग तो और भी देर से पहुंचे थे. डग अब थोडा बैटर लग रहा था. उसने सोच लिया था कि वो आज हर हाल में ऊपर चढ़ेगा. इस बार वो रुकने वाला नहीं था. 

7: 30 बजे के करीब रॉब ने अनाउंसमेंट कर दी कि अब हम चढाई के लिए तैयार है. रॉब ने ये भी कहा कि हम सबको उसके ऑर्डर मानने होंगे तभी ये मिशन  सक्सेसफुल हो पायेगा. उसने कहा, “ऊपर पहाड़ों में जो  मैं  कहूं, वही कानून होगा”.

और हम झुंड बनाकर  आगे बढने लगे, हमे साथ-साथ चलने की हिदायत दी गई थी. 


साउथ कोल के ऊपर जो जगह है उसे डेथ ज़ोन के नाम से जाना जाता है. यहाँ से जिंदा बच निकलना अपने आप में एक स्ट्रगल है. यहाँ आपकी एक-एक सांस मायने रखती है. 


हमारे पास इतनी ऑक्सीजन थी कि 4-5 घंटे निकल सके पर इससे ज्यादा  नहीं . हम उंचाई में अभी भी  मैनेज कर पा रहे थे पर ठीक से नहीं. डेथ ज़ोन में गुज़ारा हर एक मिनट हमे मौत के और करीब ले जा सकता था. 


समिट वाले दिन रॉब हॉल की टीम साउथ समिट काफी देर से पहुंची थी, दिन के करीब 1:30 बजे. उस दिन यासुको नम्बा मुझे काफी बैचेन नजर आई. वो जल्द से जल्द चोटी पर पहुंचना चाहती थी. गाईड अभी रस्सी बाँध ही रहा था कि यासुको झूलती हुई रस्सी पर चढने की कोशिश करने लगी. इस बात पर उसे काफी डांठ भी पड़ी कि इतना उतावलापन  अच्छा  नहीं  है. सिचुएशन काफी हद तक आउट ऑफ़ कण्ट्रोल हो रही थी क्योंकि सारे के सारे लोग रस्सियां पकड़ कर ऊपर चढने लगे. 

 


Summit
1:12 PM. May 10, 1996 • 29,028 Feet

मेरे बैकपेक के अंदर मेरी  मैगज़ीन के लिए एक बैनर था और एक फ्लैग जिस पर मेरी वाइफ लिंडा ने एम्ब्रोइड्री करके एक छिपकली  बनाई थी. मैंने सोचा जब  मैं  टॉप पर पहुंच जाऊँगा तो इन चीजों के साथ पिक्चर खिंचवाऊंगा. 


लेकिन फाइनली जब हम टॉप पर पहुंचे तो दूसरो की पिक्चर लेने के चक्कर में  मैं  अपनी पिक्चर खिंचवाना भूल गया, हमे जल्द से जल्द नीचे उतरना था. टॉप पर 5 मिनट से ज्यादा रहना ख़तरनाक था. लगता था जोरो का तूफ़ान आने वाला है, लेकिन मेरा सारा ध्यान अपनी ऑक्सीजन सप्लाई पर था जो  मैं साथ लेके आया था.  


मैं  जल्दी-जल्दी नीचे उतरा और हिलरी स्टेप पहुंचा, जहाँ कई climbers  खड़े रस्सियों का वेट कर रहे थे. मैंने एंडी को कहा कि वो मेरा रेगुलेटर ऑफ कर दे जब तक कि भीड़ छंट  नहीं  जाती क्योंकि  मैं  हर हाल में ऑक्सीजन बचाना  चाहता था. लेकिन एंडी ने गलती से वाल्व बंद करने के बजाए खोल दिया.


दस मिनट के अंदर मेरी सारी ऑक्सीजन निकल गई. मुझे लगा जैसे किसी ने मुझे ढेर सारी नींद की गोलियां खिला दी हो. नीचे उतरते वक्त मुझे दूसरी टीम के मेंबर दिखाई दिए. यासुको बेचारी ऊपर चढने के लिए स्ट्रगल कर रही थी और उसके फौरन बाद मुझे रॉब हॉल भी नजर आ गया. 


इस मिशन  पर हमे गाइड करने के लिए मैंने उसे थैंक यूं कहा. जब  मैं  साउथ समिट की तरफ जा रहा था तो मैंने एक गाईड को ज़ोरों से चिल्लाते सुना कि सारी ऑक्सीजन बोटल खत्म हो चुकी है. मुझे माइक ग्रूम मिला जो पहले भी बिना ऑक्सीजन चढाई से उतर चुका था. 


उसने मुझे अपनी ऑक्सीजन बोटल दे दी. जब  मैं  फाईनली पहुँच गया तो देखा कम से कम छह बोटल ऑक्सीजन बची हुई थी. लेकिन एंडी मानने को तैयार  नहीं  था. रेगुलेटर खराब होने की वजह से उसके मास्क में ऑक्सीजन  नहीं  आ रहा था . उसे खतरनाक हाईपोक्सिया हो गया था और वो अजीब सा बर्ताव  करने लगा था. मैं माइक, यासुको और एंडी से बहुत पहले साउथ समिट से निकल गया था, उस वक्त 3:30 बज  रहे थे और अब हल्की-हल्की बर्फबारी शुरू हो चुकी थी.  


मैं  बालकनी में पहुंचा तो देखा बेक weathers बर्फ में बुरी तरह से काँप रहा था. वो वहां पर अकेला था. उसकी अभी हाल ही में आँखों की  सर्जरी हुई थी जिस वजह से वो ठीक से देख  नहीं  पा रहा था. रॉब ने बेक से नीचे उतरने को कहा  तो उसने कहा कि उसे तभी साफ़-साफ दिखाई देगा जब सूरज की किरणें उन पर डायरेक्टली  नहीं  पड़ेगी. रॉब ने उसे तीस मिनट दिए कि उसे ठीक से दिखता है या नहीं.


उसने कहा उसे वेट करना होगा जब तक रॉब नीचे ना आ जाये और वो आगे अकेला नहीं बढ़  पायेगा. इसलिए वो वही खड़ा रहा, रॉब के इंतज़ार में. मैंने उसे बहुत समझाया कि वो मेरे साथ चले, पर जैसे ही मैंने कहा कि माइक नीचे आ रहा है तो उसने कहा वो मेरे साथ चलने के बजाए उसका इंतज़ार करेगा.

 

अब तक ऑक्सीजन सप्लाई भी कम हो चुकी थी. हाईपोक्सिया की वजह से अक्सर  climbers  को hallucination होने लगते है यानि उन्हें कुछ ऐसी आवाज़ आती है या कुछ ऐसा दिखता है जो रियल में होता  नहीं  है. ऐसा ही एक वाकया 1980 में एक अकेले climberके साथ हुआ था जब हाईपोक्सिया की वजह से उसे लगा एक आदमी उसके साथ चल रहा है जबकि वो एकदम अकेला था. 


मुझे फील हुआ जैसे मुझे भी ऐसा ही भ्रम हो रहा है. खैर,  मैं  जैसे-तैसे करके सही-सलामत कैंप 4 तक पहुँच ही गया.  मैं  हद से ज्यादा थक गया  था पर सेफ था. फाईनली मैंने अपने बचपन का सपना पूरा कर ही लिया था, माउंट एवरेस्ट पर चढने का, और मेरी ख़ुशी का ठिकाना  नहीं  था. 


Summit
1:25 PM., May 10, 1996 • 29,028 Feet
South Col
6:00 A.M., May 11, 1996 • 26,000 Feet


कैंप 4 पहुँचने के बाद  मैं  अपनी टीम के बाकि मेंबर्स के पहुंचने की राह देख रहा था. हम वैसे ही काफी लेट हो चुके थे और अब कैंप में सबको फ़िक्र सताने लगी. नील बीडलमैन (Neal Beidelman, ) मिशन  का एक और गाइड,एक तो वैसे ही परेशान था ऊपर से बेचारे के पास ऊपर  लोगों  से कम्यूनिकेट करने के लिए रेडियो भी  नहीं  था. 


रॉब, माइक और यासुको टाइम से पहले ही समिट पहुँच चुके थे और उन्होंने हेलेन को, जो बेस कैंप में थी, रेडियो से इस बात की खबर देदी थी. रॉब ने हेलेन से कहा कि वो डग का वेट कर रहा है और फिर दोनों नीचे आ जायेंगे. उसने उसे ये भी कहा  कि अगर मेरा अगला  कॉल ना आए तो हमारी फ़िक्र मत करना, हम ठीक है. लेकिन डग टॉप पर टाइम से नहीं पहुंच पाया और ना ही फिशर. फिशर दोपहर 3:40 पर ही समिट पहुँच गया था और डग 4 बजे. 


लौटने का  टाइम था 2 बजे और लास्ट शख्स  जो टॉप पर पहुंचा वो दो घंटे लेट था. फिशर पहले दिन बुरी तरह थका हुआ था. लेकिन उसने अपने क्लाइंट्स से ये बात छुपाये रखी. ये पिछले कुछ हफ्तों की थकान का असर था जिस वजह से उसकी तबियत खराब हो गई थी. 


नम्बा की ऑक्सीजन खत्म हो गई थी और वो भी बुरी तरह थकी हुई लग रही थी. उसने नीचे बैठते हुए कहा कि वो अब और एक इंच भी  नहीं  चल सकती. माइक ग्रूम ने उसका मास्क हटाने की कोशिश की ताकि वो खुलकर साँस ले सके पर उसने मना कर दिया. 


माइक उसे मनाने  की कोशिश करता रहा पर वो समझने को तैयार ही  नहीं  थी कि ऑक्सीजन टैंक में गैस खत्म हो चुकी है इसलिए मास्क में उसका दम घुट रहा है. अब ऊपर से बर्फीला तूफ़ान तेज़ी से बढ़ा आ रहा था. माइक बड़ी देर से नम्बा को खींचते हुए नीचे ला रहा था और अब वो खुद भी थक चुका था. बर्फ का तूफ़ान अब भयंकर आंधी में बदल रहा था. 


19 climber लापता थे और तूफ़ान के चलते रेस्क्यू मिशन फेल हो गया था. आखिरकार माइक ने डिसाइड किया कि नम्बा को वहीँ  छोड़कर वो उसकी मदद के लिए ऊपर किसी को भेजेगा, वो नीचे पहुंचा तो उसके चेहरे पर मौत की परछाई थी. उसने यासुको और बेक के लिए हेल्प भेजने को कहा. 


पिछली शाम जब  मैं  कैंप लौटा तो मैंने देखा एंडी कैंप के किनारे पर चहलकदमी कर रहा है, मैंने उसे वो न्यूज़ दी जो बेस कैंप को भेजी गई थी और उसकी गर्लफ़ंड फियोना को भी. सुबह 6 बजे मुझे पता चला कि एंडी अपने टेंट में  नहीं  है. वो कहीं मिल  नहीं  रहा था, शायद वो पहाड़ो में कहीं खो गया था या शायद मर चुका था.


 मैं बहुत तरह सिहर उठा . कल मैंने जो कुछ भी देखा था उसके बारे में सोच-सोच कर मेरा दिमाग खराब हो रहा था.  मैं  वापस उसी जगह पहुंचा जहाँ मैंने उसे आखरी बार  देखा था. मैं सोच रहा था कि आखिर वो किस रास्ते  से जा सकता है. ऐसा लग रहा था जैसे वो सीधा नीचे एक संकरे रास्ते से गया और वापस टेंट की तरफ आया ही नहीं. शायद वो इतना ज्यादा थक चुका था कि वो वापसी का सीधा रास्ता भी भूल बैठा.


मैंने उसे हर जगह ढूँढने की कोशिश की पर उसका कहीं पता  नहीं  चला. इसी बीच, मैंने बेस कैंप और रॉब हॉल के बीच की बातचीत सुनी. वो समिट रिज़ पर था और मदद के लिए पुकार रहा था. मैंने ये भी सुना कि बेक और नम्बा मर चुके है और स्कॉट लापता है.


इस बातचीत  के कुछ ही देर बाद हमारा रेडियो भी बंद हो गया. हम साउथ अफ्रीकन टीम  के पास रेडियो मांगने गए. लेकिन उन  लोगों  ने ये जानते हुए भी कि ये किसी की जिंदगी और मौत का सवाल है, हमे अपना रेडियो देने से साफ मना कर दिया. इस घटना के कई महीनों बाद जब  मैं  लोगों  के इंटरव्यू ले रहा था तो मैंने एक और climber मार्टिन एडम्स का भी इंटरव्यू लिया.  जब उसने मुझे अपना एक्सपीरिएंस सुनाया तो  बताया कि टेंट में पहुँचने से कुछ ही देर पहले उसने किसी से टेंट का रास्ता पूछा था. 


खूब माथा-पच्ची करने के बाद हमे ये बात समझ आई कि जिस आदमी को मैंने एंडी हैरिस समझकर  टेंट की तरफ आते देखा था वो असल में मार्टिन एडम्स था और दो महीने से  मैं  सबको यही कहानी सुना रहा था कि मैंने एंडी हैरिस को साउथ col. के एज़ से नीचे की तरफ जाते देखा है यानि मैंने उस दिन एंडी हैरिस को देखा ही नहीं था.


पर एंडी हैरिस के साथ असल में क्या हुआ, वो जिंदा है या मर चुका है ये कोई नहीं जानता. एंडी हैरिस का केस हमारे लिए आज तक एक रहस्य बना हुआ है. 


Summit
3:40 PM., May 10, 1996 • 29,028 Feet

स्कॉट दिन के 3 बजकर 40 मिनट पर समिट टॉप पर पहुंचा था जहाँ उसे अपना हेड शेरपा लोप्सांग  जंगबू मिल गया था. दूसरा गाईड हॉल, डग का वेट कर रहा था. स्कॉट की तबियत ठीक  नहीं  थी, इसलिए लोप्सांग  ने उसे चाय  ऑफर की. उसने थोड़ी सी चाय पी और अपना मास्क भी उतार दिया हालाँकि उसके पास काफी ऑक्सीजन मौजूद था. 


स्कॉट और उसका ग्रुप जब वहां से निकल गए  तो कुछ ही देर बाद डग भी टॉप पर पहुंच गया. आज भी लोग ये सोचकर हैरान होते है कि रॉब ने डग को काफी पहले ही क्यों नहीं लौटा दिया था, जबकि उसे पहाड़ो का अच्छा-खासा अनुभव था और वो जानता था कि आगे क्या-क्या खतरा हो सकता है. 


हॉल ने डग को 2: 30 के करीब वापस लौटने के लिए कहा था पर ये डग की पहली चढाई  नहीं  थी, पहली बार  फेल होने के बाद हॉल ने उसे कई बार कॉल करके फिर से ट्राई करने को कहा था और इस बार डग को पूरा यकीन था कि वो टॉप पर पहुंचने के लिए कुछ भी कर जायेगा क्योंकि हॉल ने ही डग को सेकंड चांस लेने के लिए कन्विंस किया था तो भला अब कैसे वो उसे वापस लौटने को कहता . दोनों एक या दो मिनट तक वहां रहे और फिर जल्दी-जल्दी नीचे उतर गए. डग की ऑक्सीजन ऊपर चढ़ते वक्त ही खत्म हो चुकी थी.


हालांकि साउथ समिट में दो बोटल पड़ी हुई थी जिन्हें रॉब नीचे उतरते वक्त ले सकता था. एंडी हैरिस ने पहले गलती से कह  दिया था कि सारी ऑक्सीजन खत्म हो चुकी है. उस वक्त शायद वो हाईपोक्सिक की हालत में बडबडा रहा था. माइक ग्रूम ने एंडी और रॉब की बातचीत सुन ली थी तो वो उसे सही इन्फोर्मेशन देना चाहता था पर बदकिस्मती से उसका रेडियो खराब हो गया था. 


दोनों जब हिलरी स्टेप पहुंचे तो रॉब के लिए डग को नीचे लेकर जाना मुश्किल हो गया. हालाँकि वो खुद नीचे उतर गया था. लोप्सांग  को रास्ते में एंडी मिला. उसे पता चल गया था कि साउथ समिट में काफी ऑक्सीजन पड़ी है. एंडी ने लोप्सांग  से रिक्वेस्ट की  कि वो रॉब और डग तक ऑक्सीजन पहुंचा दे, बदले में वो उसे 500 डॉलर देगा,पर लोप्सांग  ने ये कहते हुए इंकार कर दिया कि उस पर अपने ग्रुप की ज़िम्मेदारी  है और वो उन्हें छोड़कर कहीं  नहीं जा सकता. 


पर हैरिस नीचे  नहीं  उतरा, उसने बहादुरी दिखाते हुए उन दो  लोगों  की मदद करने का फैसला किया जो ऊपर फंसे हुए थे. स्कॉट अब तक बेहद फ्रस्ट्रेट हो चुका था. थकान के मारे उसका बुरा हाल था और वो पागलों की तरह बडबडाए जा रहा था. यहाँ तक कि वो नीचे कूदकर अपनी जान देने जा रहा था. पर सही टाइम पर लोप्सांग  ने उसे पकड़कर एक र्स्स्सी से बाँध दिया. 


दोनों आदमी नीचे की तरफ उतरने लगे तो उन्हें मकालू गाऊ मिला, ताईवानीज़ ग्रुप का लीडर. गाऊ और स्कॉट बिलकुल भी हिलडुल  नहीं  पा रहे थे. लोप्सांग  स्कॉट को अपने कन्धो पर उठाने की कोशिश करने लगा, लेकिन स्कॉट काफी भरकम था इसलिए वो उसे उठा  नहीं  पा रहा था. लोप्सांग  ने डिसाइड किया कि वो अकेला ही नीचे उतरेगा और स्कॉट के लिए मदद  भेजेगा. 


अगली सुबह रॉब हॉल 4:43 बजे साउथ समिट पहुँच गया. इस बार ना तो डग और ना ही एंडी उसके साथ थे. वो काफी कन्फ्यूज़ था और रेडियो पर बेस कैंप के डॉक्टर से बात करते हुए अजीबो-गरीब बातें कर रहा था. उसके पास ऑक्सीजन की कमी  नहीं  थी पर उसके मास्क में बर्फ भर गई थी. वो बार-बार यही बोल रहा था कि उसके क्लाइंट्स कहाँ है और एंडी कहाँ है. तो डॉक्टर को उससे झूठ बोलना पड़ा कि एडी नीचे बेस कैंप में है. डॉक्टर ने जब रॉब से डग के बारे में पूछा तो उसने कहा” वो जा चुका है”.


हैंसन की बॉडी कभी  नहीं  मिल पाई. शायद वो साउथवेस्ट से नीचे गिरकर मौत के मुंह में समा गया  था. एंडी हैरिस का भी कुछ पता  नहीं  चल पाया कि उसके साथ क्या हुआ. 


सुबह 9 बजे के करीब फाइनली हॉल ने अपने मास्क से सारी बर्फ हटाई. उसने जमीन से 28,700 फीट ऊपर बिना गैस के 16 घंटे गुज़ारे थे. सुबह 9:30 बजे दो शेरपा ऑक्सीजन सप्लाई और चाय लेकर ऊपर आये और हॉल को बचा लिया गया. तीन शेरपा स्कॉट और गाऊ को रेस्क्यू करने गए थे. जब वो लोग उनके पास पहुंचे तो स्कॉट की साँस मुश्किल से चल रही थी. शेरपाज़ को लगा शायद स्कॉट अब  नहीं  बचेगा इसलिए उन्होंने उसे वही छोड़ दिया और  गाऊ को साथ लेकर नीचे उतर गए.


जो शेरपा हॉल को रेस्क्यू करने ऊपर चढ़े थे, अब वो जल्दी-जल्दी नीचे उतर रहे थे क्योंकि ठंड काफी बढ़ गई थी और तेज़ हवाएं  चलने लगी थी, उस वक्त दोपहर के करीब 3:30 बज रहे थे. रॉब के दोस्त उसे कन्विंस कर रहे थे कि वो थोड़ी हिम्मत रखे और नीचे उतरने की कोशिश करे. लेकिन वो यही बोले जा रहा था कि अगर वो ऐसा कर सकता तो छह घंटे पहले ही कर चुका होता. 


उसने कहा कि वो कुछ लड़कों  को थोड़ी चाय लेकर ऊपर भेजे,  मैं  ठीक हो जाउंगा. शाम के 6:20 पर रॉब ने अपनी वाइफ से बात की, बोलने से पहले उसने थोड़ी सी बर्फ खा ली थी क्योंकि उसका मुंह सूख रहा था. उसने आखिरी बार अपनी वाइफ को यही कहा  कि वो उसे बहुत प्यार करता है और वो उसकी चिंता ना करे और सो जाये. 

इस आखिरी कॉल के बाद रॉब से कांटेक्ट करने की कई बार कोशिश की गई पर उसने जवाब  नहीं  दिया और बाहर घंटे बाद रॉब हॉल की डेड बॉडी ताज़ी गिरी बर्फ पर पड़ी मिली थी. 

 

Northeast Ridge
May 10, 1996 • 28,550 Feet, South Col
7:30 A.M., May 11, 1996 • 26,000 Feet, The Geneva Spür
9:45 A.M., May 12, 1996 • 25,900 Feet, Everest Base Camp
May 13, 1996 • 17,600 Feet


चार शेरपा को नम्बा और बेक की डेड बॉडीढूँढने ऊपर भेजा गया. दोनों बॉडी बर्फ में आधी ढकी हुई मिली. उन्हें पहले नम्बा की बॉडी मिली तो उन्हें पता चला कि उसकी साँस अभी चल रही थी. उसके बाद जब उन्होंने बेक की बॉडी को पलटकर उसके चेहरे से बर्फ हटाई तो पता चला वो भी अभी जिंदा था. इसका एक glove  गायब था और उसे बुरी तरह से फ्रोस्टबाईट हुआ था यानी वो जगह सुन्न हो गया था. 


लेकिन शेरपाज़ ने आपस में फैसला कर लिया था कि उन्हें नीचे कैंप 4 तक घसीट कर ले जाने का कोई फायदा  नहीं  है और जो लोग जिंदा है उनकी जान खतरे में पड़ सकती है. बेक बर्फ पर पड़ा रहा और अगले दिन दोपहर तक बेक को होश आ गया  था. वो गिरते-पड़ते किसी तरह टेंट तक पहुंचा, उसे अर्जेंट डॉक्टर की जरूरत थी.


बेक को जिंदा वापस देखकर स्कॉट के लिए भी एक और रेस्क्यू टीम भेजी गई, लेकिन उसका ऑक्सीजन बोटल खाली था और स्कॉट फिशर मर चुका था. बाकि बचे लोग नीचे कैंप टू में वापस आ गए थे जहाँ सारे डॉक्टर मौजूद थे. बेक और गाऊ को काठमांडू हॉस्पिटल  भेज दिया गया. 


मैं  13 मई को जब नीचे बेस कैंप पहुंचा तो अपने साथियों  को याद करके बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोया. कितने लापता थे और कितने ही मर चुके थे.काठमांडू एयरपोर्ट पहुँचने पर मेरी मुलाक़ात नम्बा के पति  और  भाई से हुई. वो मुझसे उसके बारे में कई सवाल पूछ रहे थे पर  मैं  उन्हें ज्यादा कुछ  नहीं  बता पाया. कई रिपोर्टर  ने हमारे इंटरव्यू लिए.


19 मई को फाईनली  मैं  अपने घर पहुंचा. एयरपोर्ट पर  मैं  डग की गर्लफ्रेंड और उसके दोनों बच्चों  से भी मिला जिन्हें मैंने डग की चीज़े दी. रॉब हॉल के मिशन  के छह climbers में से सिर्फ दो वापस लौटे थे. मुझे हमेशा महसूस  होता रहा कि एंडी की मौत में मेरा कहीं ना कहीं डायरेक्ट हाथ  था और नम्बा जब जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही थी, उस वक्त  मैं  अपने टेंट में उससे सिर्फ 350 यार्ड दूर था.


 मैं  कई महीनों उदास और दुखी रहा पर आज तक मेरे दिल से ये पछतावा नहीं गया कि  मैं  उन्हें बचा सकता था. माउंट एवरेस्ट की चोटी तक पहुँच पाना एक बेहद एक्स्ट्राऑर्डिनरी  टास्क है जिसमे कई बार दुनिया के बड़े से बड़े माउंटेनियरफेल हो जाते है और जान से हाथ धो बैठते है.  मैं  खुद अपने एक्सपीरिएंस से ये कह सकता हूँ कि चोटी पर  चढ़ना तो फिर भी आसान  है पर नीचे जिंदा लौट आना कहीं ज्यादा मुश्किल है. 


Conclusion

“इनटू थिन एयर” नाम की ये बुक जर्नलिस्ट जॉन क्रेकौएर की पर्सनल अकाउंट पर बेस्ड सच्ची कहानीहै जो उन्होंने दुनिया की सबसे ऊँची चोटी यानि माउंट एवरेस्ट मिशन  के उस हादसे को लेकर लिखी है जिसमे वो बाल-बाल बच गए थे. आपने इस समरी में दो एक्स्पिरियेंस्ड माउंटेनियर रॉब हॉल और स्कॉट फिशर के बारे में पढ़ा जिन्होंने अपने क्लाइंट्स को टॉप तक पहुँचाने की खातिर सारी हदे पार कर दी थी.


आपने उन आदमियों और औरतों के बारे में भी पढ़ा जिन्होंने बड़ी दिलेरी के साथ अपने साथियों की मदद की  और  आखिरी दम तक एक-दूसरे की जान बचाने की कोशिश करते रहे. ये किस्सा कुछ इस तरह बयान किया गया है जिसे पढ़ते वक्त रीडर्स के सामने उस दर्दनाक हादसे की एक-एक तस्वीर उभर आती है जो दुनिया की सबसे ऊंची चोटी कहे जाने वाले माउंट एवरेस्ट के इतिहास में आज से पहले कभी  नहीं  घटी थी!


Post a Comment

0 Comments